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Wednesday, 3 December 2014

भोपाल गैस त्रासदी के तीस बरस

तीस बरस बीत गए भोपाल गैस त्रासदी के

देखते-देखते भोपाल गैस त्रासदी के तीस बरस बीत गए। हर वर्ष 3 दिसम्बर को मन में कई सवाल उठकर अनुत्तरित रह जाते हैं। हमारे देश में मानव जीवन कितना सस्ता और मृत्यु कितनी सहज है इसका अनुमान इस विभीषिका से लगाया जा सकता है, जिसमें हजारोें लोग अकाल मौत के मुँह में चले गए और लाखों लोग प्रभावित हुए। इस त्रासदी से जहाँ एक ओर हजारों पीडि़तों का शेष जीवन घातक बीमारियों, अंधेपन एवं अपंगता का अभिशाप बना गया तो दूसरी ओर अनेक घरों के दीपक बुझ गए। इससे प्रभावित बच्चों, जवानों की जीवन शक्ति का क्षय हो गया और उनकी आयु घट गई। हजारों परिवार निराश्रित और बेघर हो गये, जिन्हें तत्काल जैसी सहायता व सहानुभूति मिलनी चाहिए थी वह न मिली।   
          विकासशील देशों को विकसित देश तकनीकी प्रगति एवं औद्योगिक विकास और सहायता के नाम पर वहाँ त्याज्य एवं निरूपयोगी सौगात देते हैं, इसका सबसे बड़ा उदाहरण यूनियन कार्बाइड काॅरपोरेशन है, जिसके कारण हजारों लोग मारे गए, कई हजार कष्ट और पीड़ा से संत्रस्त हो गए लेकिन उनकी समुचित सहायता व सार-संभाल नहीं हुई, जिससे पीडितों को उचित क्षतिपूर्ति के लिए कानूनी कार्यवाही एवं नैतिक दबाव का सहारा लेना पड़ा। यदि अमेरिका में ऐसी दुर्घटना होती तो वहाँ की समूची व्यवस्था क्षतिग्रस्तों को यथेष्ट सहायता मुहैया कराकर ही दम लेती। अमेरिका में ऐसे कई उदाहरण हैं जिसमें जनजीवन को अरक्षा व अनिष्ट के लिए जिम्मेदार कम्पनियों एवं संस्थानों ने करोड़ों डालरों की क्षतिपूर्ति दी, लेकिन गरीब देशों के नागरिकों का जीवन मोल विकसित देशों के मुकाबले अतिशय सस्ता आंका जाना इस त्रासदी से आसानी से समझ में आता है।
         इस विभाीषिका से एक साथ कई मसले सामने आये। एक तो ऐसे कारखानों को घनी आबादी के बीच लगाने की अनुमति क्यों दी गई, जहाँं विषाक्त गैसों का भंडारण एवं उत्पादकों में प्रयोग होता है। यह कीटनाशक कारखाना देश का सबसे विशाल कारखाना था, जिसने सुरक्षा व्यवस्था और राजनीतिक सांठ-गांठ की पोल खोल दी। यह दुर्घटना विश्व में अपने ढंग की पहली घटना थी। विभीषिका से पूर्व भी संयंत्र में कई बार गैस रिसाव की घटनायें घट चुकी थी, जिसमें कम से कम दस श्रमिक मारे गए थे। 2-3 दिसम्बर 1984 की दुर्घटना मिथाइल आइसोसाइनेट नामक जहरीली गैस से हुई। कहते हैं कि इस गैस को बनाने के लिए फोस जेन नामक गैस का प्रयोग होता है। फोसजेन गैस भयावह रूप से विषाक्त और खतरनाक है। कहा जाता है कि हिटलर ने यहूदियों के सामूहिक संहार के लिए गैस चेम्बर बनाये थे जिसमें यह गैस भरी हुई थी। ऐसे खतरनाक एवं प्राणघातक उत्पादनों के साथ संभावित खतरों का पूर्व आकलन एवं समुचित उपाय किए जाते हैं। मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने यदि सुरक्षा उपाय हेतु ठोस कदम उठाए होते तो इस विभीषिका से बचा जा सकता था। पूर्व की दुर्घटनाओं के बाद कारखाने की प्रबंध व्यवस्था ने उचित कदम नहीं उठाए और शासन प्रशासन भी कत्र्तव्यपालन से विमुख व उदासीन बना रहा नतीजन हजारों लोगों इस आकस्मिक विपदा के शिकार होना पड़ा। 
         तीस बरस बीत जाने पर भी दुर्घटना स्थल पर पड़े केमिकल कचरे को अब तक ठिकाने न लगा पाना और गैस पीडि़तों को समुचित न्याय न मिल पाना शासन प्रशासन की कई कमजोरियों को उजागर करती है।
 KAVITA RAWAT के ब्लॉग से साभार 

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